Nation, politics, Religion

ईसाई मिशनरी का काला सच….!

साल 2006 में हॉलीवुड की एक ब्लॉकबस्टर फ़िल्म The Vinci code रिलीज हुई थी जिसे भारत में प्रदर्शित होने पर रोक लगा दिया गया था…?

लेकिन क्यों, ऐसा क्या था उस फिल्म में…?

एक और बात की रजनीश ओसो ने ऐसा क्या कह दिया था जिससे उदारवादी कहे जाने वाले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटने वाला अमेरिका रातों-रात उनका दुश्मन हो गया था और उनको जेल में डालकर यातनायें दी गयी और जेल में उनको थैलियम नामक धीमा जहर दिया गया जिससे उनकी बाद में मृत्यु हो गयी…!

क्यों वैटिकन का पोप बेनेडिक्ट उनका दुश्मन हो गया और पोप ने उनको जेल में प्रताड़ित किया…?

दरअसल इस सब के पीछे ईसाइयत का वो बदनुमा झूठ है जिसके खुलते ही पूरी ईसाईयत भरभरा के गिर जायेगी, और वो झूठ है इसा मसीह के 13 वर्ष से 30 वर्ष के बीच के 17 वर्षों का गायब होना…!

आखिर इसा मसीह की कथित रचना बाइबिल में उनके जीवन के इन 17 वर्षों का कोई ब्यौरा क्यों नहीं है…?

ईसाई मान्यता के अनुसार सूली पर लटका कर मार दिए जाने के बाद इसा मसीह फिर जिन्दा हो गया थे, तो जब जिन्दा हो गए थे तो वो फिर कहाँ गए इसका भी कोई अता-पता बाइबिल में नहीं है, ओशो ने अपने प्रवचन में ईसा के इसी अज्ञात जीवनकाल के बारे में विस्तार से बताया था, जिसके बाद उनको ना सिर्फ अमेरिका से प्रताड़ित करके निकाला गया बल्कि पोप ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उनको 21 अन्य ईसाई देशों में शरण देने से मना कर दिया गया…!

दरअसल हकीकत तो ये है की ईसाईयत को ईसा से कोई लेना देना नहीं है, अविवाहित माँ की औलाद होने के कारण बालक ईसा समाज में अपमानित और प्रताडित करे गए जिसके कारण वे 13 वर्ष की उम्र में ही भारत आ गए थे, यहाँ उन्होंने हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म के प्रभाव में शिक्षा दीक्षा ली, एक गाल पर थप्पड़ मारने पर दूसरा गाल आगे करने का सिद्धान्त सिर्फ भारतीय धर्मो में ही है, ईसा के मूल धर्म यहूदी धर्म में तो आँख के बदले आँख और हाथ के बदले हाथ का सिद्धान्त था, भारत से धर्म और योग की शिक्षा दीक्षा लेकर ईसा प्रेम और भाईचारे के सन्देश के साथ वापिस जूडिया पहुँचे, इस बीच रास्ते में उनके प्रवचन सुनकर उनके अनुयायी भी बहुत हो चुके थे…!

इस बीच प्रभु ईसा के दो निकटतम अनुयायी पीटर और क्रिस्टोफर थे इनमें पीटर उनका सच्चा अनुयायी था जबकि क्रिस्टोफर धूर्त और लालची था, जब ईसा ने जूडिया पहुंचकर बहुसंख्यक यहूदियों के बीच अपने अहिंसा और भाईचारे के सिद्धान्त दिए तो अधिकाधिक यहूदी लोग उनके अनुयायी बनने लगे, जिससे यहूदियों को अपने धर्म पर खतरा मंडराता हुआ नजर आया तो उन्होंने रोम के राजा Pontius Pilatus पर दबाव बनाकर उसको ईसा को सूली पर चढाने के लिए विवश किया गया…!

इसमें क्रिस्टोफर ने यहूदियों के साथ मिलकर ईसा को मरवाने का पूरा षड़यंत्र रचा, हालाँकि राजा Pontius को ईसा से कोई बैर नहीं था और वो मूर्तिपूजक Pagan धर्म जो ईसाईयत और यहूदी धर्म से पहले उस क्षेत्र में काफी प्रचलित था और हिन्दू धर्म से अत्यधिक समानता वाला धर्म है का अनुयायी था…!

राजा अगर ईसा को सूली पर न चढाता तो बहुसंख्यक यहूदी उसके विरोधी हो जाते और सूली पर चढाने पर वो एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या के दोष में ग्लानि अनुभव् करता तो उसने पीटर और ईसा के कुछ अन्य विश्वस्त भक्तों के साथ मिलकर एक गुप्त योजना बनाई…!

अब पहले मैं आपको यहूदियों की सूली के बारे में बता दूँ, ये विश्व का सजा देने का सबसे क्रूरतम और जघन्यतम तरीका है इसमें व्यक्ति के शरीर में अनेक कीले ठोंक दी जाती हैं जिनके कारण व्यक्ति धीरे धीरे मरता है, एक स्वस्थ व्यक्ति को सूली पर लटकाने के बाद मरने में 48 घंटे तक का समय लग जाता है और कुछ मामलो में तो 6 दिन तक भी लगे हैं, तो गुप्त योजना के अनुसार ईसा को सूली पर चढाने में जानबूझकर देरी की गयी और उनको शुक्रवार को दोपहर में सूली पर चढ़ाया गया, और शनिवार का दिन यहूदियों के लिए शब्बत का दिन होता हैं इस दिन वे कोई काम नहीं करते, शाम होते ही ईसा को सूली से उतारकर गुफा में रखा गया ताकि शब्बत के बाद उनको दोबारा सूली पर चढ़ाया जा सके…!

उनके शरीर को जिस गुफा में रखा गया था उसके पहरेदार भी Pagan ही रखे गए थे रात को राजा के गुप्त आदेश के अनुसार पहरेदारों ने पीटर और उसके सथियों को घायल ईसा को चोरी करके ले जाने दिया गया और बात फैलाई गयी की इसा का शरीर गायब हो गया और जब वो गायब हुआ तो पहरेदारों को अपने आप नींद आ गयी थी, इसके बाद कुछ लोगों ने पुनर्जन्म लिये हुए ईसा को भागते हुए भी देखा, असल में तब जीसस अपनी माँ Marry Magladin और अपने खास अनुयायियों के साथ भागकर वापिस भारत आ गए थे…!

इसके बाद जब ईसा के पुनर्जन्म और चमत्कारों के सच्चे झूठे किस्से जनता में लोकप्रिय होने लगे और यहूदियों को अपने द्वारा उस चमत्कारी पुरुष को सूली पर चढाने के ऊपर ग्लानि होने लगी और एक बड़े वर्ग का अपने यहूदी धर्म से मोह भंग होने लगा तो इस बढ़ते असंतोष को नियंत्रित करने का कार्य इसा के ही शिष्य क्रिस्टोफर को सौंपा गया क्योंकि क्रिस्टोफर ने ईसा के सब प्रवचन सुन रखे थे, तो यहूदी धर्म गुरुओं और क्रिस्टोफर ने मिलकर यहूदी धर्म ग्रन्थ Old Testament और ईसा के प्रवचनों को मिलाकर एक नए ग्रन्थ New Testament अर्थात Bible की रचना की और उसी के अधार पर एक ऐसे नए धर्म ईसाईयत अथवा Christianity की रचना की गयी जो यहूदियों के नियंत्रण में था, इसका नामकरण भी ईसा की बजाये Christopher के नाम पर किया गया…!

ईसा के इसके बाद के जीवन के ऊपर खुलासा जर्मन विद्वान् Holger Christen ने अपनी पुस्तक Jesus Lived In India में किया है, Christen ने अपनी पुस्तक में रुसी विद्वान Nicolai Notovich की भारत यात्रा का वर्णन करते हुए बताया है कि निकोलाई 1887 में भारत भ्रमण पर आये थे, जब वे जोजिला दर्र्रा पर घुमने गए तो वहां वो एक बोद्ध मोनास्ट्री में रुके, जहाँ पर उनको Issa नमक बोधिसत्तव संत के बारे में बताया गया, जब निकोलाई ने Issa की शिक्षाओं जीवन और अन्य जानकारियों के बारे में सुना तो वे हैरान रह गए क्योंकि उनकी सब बातें जीसस, ईसा से मिलती थी…!

इसके बाद निकोलाई ने इस सम्बन्ध में और गहन शोध करने का निर्णय लिया और वो कश्मीर पहुंचे जहाँ जीसस की कब्र होने की बातें सामने आती रही थी, निकोलाई की शोध के अनुसार सूली पर से बचकर भागने के बाद जीसस Turkey, Persia (Iran) और पश्चिमी यूरोप, संभवतया इंग्लैंड से होते हुए 16 वर्ष में भारत पहुंचे, जहाँ पहुँचने के बाद उनकी माँ मैरी का निधन हो गया था, जीसस यहाँ अपने शिष्यों के साथ चरवाहे का जीवन व्यतीत करते हुए 112 वर्ष की उम्र तक जिए और फिर मृत्यु के पश्चात् उनको कश्मीर के पहलगाम में दफना दिया गया…!

पहलगाम का अर्थ ही गड़रियों का गाँव हैं और ये अद्भुत संयोग ही है कि यहूदियों के महानतम पैगम्बर हजरत मूसा ने भी अपना जीवन त्यागने के लिए भारत को ही चुना था और उनकी कब्र भी पहलगाम में जीसस की कब्र के साथ ही है…!

संभवतया जीसस ने ये स्थान इसीलिए चुना होगा क्योंकि वे हजरत मूसा की कब्र के पास दफ़न होना चाहते थे हालाँकि इन कब्रों पर मुस्लिम भी अपना दावा ठोंकते हैं और कश्मीर सरकार ने इन कब्रों को मुस्लिम कब्रें घोषित कर दिया है और किसी भी गैरमुस्लिम को वहां जाने की इजाजत अब नहीं है, लेकिन इन कब्रों की देखभाल पीढ़ियों दर पीढ़ियों से एक यहूदी परिवार ही करता आ रहा है इन कब्रों के मुस्लिम कब्रें न होने के पुख्ता प्रमाण हैं…!

सभी मुस्लिम कब्रें मक्का और मदीना की तरफ सर करके बनायीं जाती हैं जबकि इन कब्रों के साथ ऐसा नहीं है, इन कब्रों पर हिब्रू भाषा में Moses और Joshua भी लिखा हुआ है जो कि हिब्रू भाषा में क्रमश मूसा और जीसस के नाम हैं और हिब्रू भाषा यहूदियों की भाषा थी, अगर ये मुस्लिम कब्र होती तो इन पर उर्दू या अरबी या फारसी भाषा में नाम लिखे होते…!

सूली पर से भागने के बाद ईसा का प्रथम वर्णन तुर्की में मिलता है पारसी विद्वान् F Muhammad ने अपनी पुस्तक Jami- Ut- Tuwarik में लिखा है कि Nisibi(Todays Nusaybin in Turky) के राजा ने जीसस को शाही आमंत्रण पर अपने राज्य में बुलाया था, इसके आलावा तुर्की और पर्शिया की प्राचीन कहानियों में Yuj Asaf नाम के एक संत का जिक्र मिलता है, जिसकी शिक्षाएं और जीवन की कहनियाँ ईसा से मिलती हैं…!

यहाँ आप सब को एक बात का ध्यान दिला दू की इस्लामिक नाम और देशों के नाम पढ़कर भ्रमित न हो क्योंकि ये बात इस्लाम के अस्तित्व में आने से लगभग 600 साल पहले की हैं…!

यहाँ आपको ये बताना भी महत्वपूर्ण है कि कुछ विद्वानों के अनुसार ईसाइयत से पहले Alexendria तक सनातन और बौध धर्म का प्रसार था, इसके आलावा कुछ प्रमाण ईसाई ग्रंथ Apocrypha से भी मिलते हैं, ये Apostles के लिखे हुए ग्रंथ हैं लेकिन चर्च ने इनको अधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया और इन्हें सुने सुनाये मानता है…!

Apocryphal (Act of Thomas) के अनुसार सूली पर लटकाने के बाद कई बार जीसस Sent Thomus से मिले भी और इस बात का वर्णन फतेहपुर सिकरी के पत्थर के शिलालेखो पर भी मिलता है, इनमे Agrapha शामिल है जिसमे जीसस की कही हुई बातें लिखी हैं जिनको जान बुझकर बाइबिल में जगह नहीं दी गयी और जो जीसस के जीवन के अज्ञातकाल के बारे में जानकारी देती हैं…!

इसके अलावा उनकी वे शिक्षाएं भी बाइबिल में शामिल नहीं की गयी जिनमे कर्म और पुनर्जन्म की बात की गयी है जो पूरी तरह पूर्व के धर्मो से ली गयी है और पश्चिम के लिए एकदम नयी चीज थी, लेखक Christen का कहना है की इस बात के 21 से भी ज्यादा प्रमाण हैं कि जीसस Issa नाम से कश्मीर में रहा और पर्शिया व तुर्की का मशहूर संत Yuj Asaf जीसस ही था, जीसस का जिक्र कुर्द लोगों की प्राचीन कहानियों में भी है, Kristen हिन्दू धर्म ग्रंथ भविष्य पुराण का हवाला देते हुए कहता है कि जीसस कुषाण क्षेत्र पर 39 से 50 AD में राज करने वाले राजा शालिवाहन के दरबार में Issa Nath नाम से कुछ समय अतिथि बनकर रहा…!

इसके अलावा कल्हण की राजतरंगिणी में भी Issana नाम के एक संत का जिक्र है जो डल झील के किनारे रहा, इसके अलावा ऋषिकेश की एक गुफा में भी Issa Nath की तपस्या करने के प्रमाण हैं। जहाँ वो शैव उपासना पद्धति के नाथ संप्रदाय के साधुओं के साथ तपस्या करते थे, स्वामी रामतीर्थ जी और स्वामी रामदास जी को भी ऋषिकेश में तप करते हुए उनके दृष्टान्त होने का वर्णन है…!

विवादित हॉलीवुड फ़िल्म The Vinci Code में भी यही दिखाया गया है कि ईसा एक साधारण मानव थे और उनके बच्चे भी थे, इसा को सूली पर टांगने के बाद यहूदियों ने ही उसे अपने फायदे के लिए भगवान बनाया, वास्तव में इसा का Christianity और Bible से कोई लेना देना नहीं था…!

आज भी वैटिकन पर Illuminati अर्थात यहूदियों का ही नियंत्रण है और उन्होंने इसा के जीवन की सच्चाई और उनकी असली शिक्षाओं को छुपा के रखा है…!

वैटिकन की लाइब्रेरी में बाहर के लोगों को इसी भय से प्रवेश नहीं करने दिया जाता क्योंकि अगर ईसा की भारत से ली गयी शिक्षाओं, उनके भारत में बिताये गए समय और उनके बारे में बोले गए झूठ का अगर पर्दाफाश हो गया तो ये ईसाईयत का अंत होगा और Illuminati की ताकत एकदम कम हो जायेगी…!

भारत में धर्मान्तरण का कार्य कर रहे वैटिकन/Illuminati के एजेंट ईसाई मिशनरी भी इसी कारण से ईसाईयत के रहस्य से पर्दा उठाने वाली हर चीज का पुरजोर विरोध करते हैं, जीसस जहाँ खुद हिन्दू धर्मं/भारतीय धर्मों को मानते थे, वहीँ उनके नाम पर वैटिकन के ये एजेंट भोले-भाले गरीब लोगों को वापिस उसी पैशाचिकता की तरफ लेकर जा रहे हैं जिन्होंने Issa Nath को तड़पा तड़पाकर मारने का प्रयास किया था, जिस सनातन धर्म को Issa ने इतने कष्ट सहकर खुद आत्मसात किया था उसी धर्म के भोले भाले गरीब लोगों को Issa का ही नाम लेकर वापिस उसी पैशाचिकता की तरफ ले जाया जा रहा है…!

साभार- गूगल

Advertisements
Nation, Religion

काल्पनिक जोधाबाई का वास्तविक सत्य

वैसे तो वामपंथियों, मुस्लिम, अंग्रेज, कांग्रेसी इतिहासकारों ने हिन्दु इतिहास को कलंकित करने तथा मिटाने में कोई कसर नही छोडी और इतना ही नही उन्होंने मनगढंत कई काल्पनिक पात्र तक बना डाले।क्योंकि आमने-सामने न तो उनके पुरखे अपने स्वप्न पूरे कर सके न ही ये।

और इन्हीं पात्रो को हमारे ही समाज के दलाल अपने फायदे के लिए खूब भुनाते है।इसी प्रकार का एक कल्पना पर आधारित मनगढंत पात्र है “जोधाबाई”जिसका इतिहास मे कोई प्रमाण नही, इसका वास्तविक सत्य हम आपको बताते है।

मुगल-राजपूत वैवाहिक सम्ब्न्द्धो का बार-बार जो जिक्र करते है उन्होंने कभी इतिहास तो क्या कक्षा 9 अथवा 10 की इतिहास की पुस्तक नही पढी होगी।कृपया इसे अधिक से अधिक शेयर करे ताकि अधिक लोग जागरूक हो।

1 – अकबरनामा (Akbarnama) में जोधा का कहीं कोई उल्लेख या प्रचलन नही है।।इस पुस्तक मे अकबर के बारे मे एक एक बात प्रमाणित दी गई है।उसके प्रत्येक सगे-सम्बन्धी इत्यादि के बारे मे, अगर कोई बात इस पुस्तक से मेल नही खाती तो इतिहासकार उसे अधिक तवज्जो नही देते है।और इस पूरी पुस्तक मे हुकुम “जोधा” शब्द का उल्लेख नही है जोधा तो दूर अकबर की किसी हिन्दु रानी का उल्लेख नही है।

2- तुजुक-ए-जहांगिरी-(जहांगीर की आत्मकथा /BIOGRAPHY of Jahangir) में भी जोधा का कहीं कोई उल्लेख नही है। जब की एतिहासिक दावे और झूठे सीरियल यह कहते हैं की जोधा बाई अकबर की पत्नी व जहांगीर की माँ थी जब की हकीकत यह है की “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोई नाम नहीं है, जोधा का असली नाम {मरियम- उल-जमानी}( Mariam uz-Zamani ) था जो कि आमेर के राजा भारमल के विवाह के दहेज में आई परसीयन दासी की पुत्री थी उसका लालन पालन राजपूताना में हुआ था इसलिए वह राजपूती रीती रिवाजों को भली भाँती जानती थी तथा राजपूतो मे रहने के कारण शस्त्र विद्या मे भी निपुण थीऔर राजपूतों में उसे हीरा कुँवरनी (हरका) कहते थे, यह राजा भारमल की कूटनीतिक चाल थी, राजा भारमल एक चतुर राजा थे जो तलवार के साथ-साथ अपनी बुद्धि का बखूबी उपयोग करते थे।वे जानते थे की अकबर की सेना संख्या में उनकी सेना से बड़ी है क्योंकि उनकी तरफ से हर एक इस्लामिक व्यक्ति लडता था जो कि लाखों मे सँख्या पहुँचती और आर्यों मे लडने का कार्य सिर्फ”क्षत्रियो” का था। अतः युद्व विदेशियों की भारी-भरकम सेना तथा राजपूत टुकडियों मे होता था, फिर भी विजयश्री हमेशा राजपूतो का वरण करती।

राजा भारमल वृद्ध भी थे उन्हें पता था कि अगर युद्व होता है तो राजपूतो को तो इन्तजार ही रहता था रणशौर्य दिखलाने का परंतु वहाँ की सारी प्रजा जो शस्त्र चलाना तो दूर देखे तक नही थे उनका क्या होगा। वहीं दूसरी तरफ वे मुगलो की बर्बरता से अच्छी तरह वाकिफ थे।इसलिए राजा भारमल ने हवसी अकबर को बेवकूफ बनाकर उससे सन्धि करना ठीक समझा , इससे पूर्व में अकबर ने एक बार राजा भारमल की पुत्री से विवाह करने का प्रस्ताव रखा था जिस पर भारमल ने कड़े शब्दों में क्रोधित होकर प्रस्ताव ठुकरा दिया था , परंतु बाद में राजा के दिमाग में युक्ती सूझी , उन्होने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और परसियन दासी को हरका बाई बनाकर उसका विवाह रचा दिया , क्योकी राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था इसलिये वह राजा भारमल की धर्म पुत्री थी लेकिन वह कछ्वाहा क्षत्रिय राजकुमारी नही थी ।। उन्होंने यह प्रस्ताव को एक AGREEMENT की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था ।।

3- अरब में “बहुत सी किताबों” में लिखा है हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें संदेह है ।।

4- ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में इन्डियन मुगलों का विवाह एक परसियन दासी से करवाए जाने की बात लिखी है ।।

5- अकबर-ए-महुरियत में यह साफ-साफ लिखा है कि (we dont have trust in this Rajput marriage because at the time of mariage there was not even a single tear in any one’s eye even then the Hindu’s God Bharai Rasam was also not Happened ) “हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है क्यौकी निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नही थे सभी प्रसन्न थे जैसे कि कोई जंग जीती हो। और ना ही हिन्दू गोद भराई की रस्म हुई थी ।। क्योंकि विश्व मे सबसे अधिक त्यौहार व रस्मों रिवाज राजपूतो मे बडी शानोशौकत से होते है।

6- उस वक्त महाराजा भारमल के समकालीन सिक्ख धर्म के गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के समय यह बात स्वीकारी थी कि (written in Punjabi font – “ਰਾਜਪੁਤਾਨਾ ਆਬ ਤਲਵਾਰੋ ਓਰ ਦਿਮਾਗ ਦੋਨੋ ਸੇ ਕਾਮ ਲੇਨੇ ਲਾਗਹ ਗਯਾ ਹੈ “ ) कि क्षत्रियो , ने अब तलवारों और बुद्धी दोनो का इस्तेमाल करना सीख लिया है , मतलब राजपुताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धि का भी काम लेने लगा है ।। ( At the time of this fake mariage the Guru of Sikh Religion ” Arjun Dev and Guru Govind Singh” also admited that now Kshatriya Rajputs have learned to use the swords with brain also !! )

7- 17वी सदी में जब पारसीभारत भ्रमण के लिये आये तब उन्होंने अपनी रचना (Book) ” परसी तित्ता/PersiTitta ” में यह लिखा है की “यहाँ एक भारतीय महाराजा एक परसियन वैश्या को शाही हरम में भेज रहा है , अत: हमारे देव (अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें ( In 17 th centuary when the Persian came to India So they wrote in there book (Persi Titta)that ” This Indian King is sending a Persian prostitude to her right And deservable place and May our God (Ahura Mazda) give Heaven to this Indian King.

8- हमारे इतिहास में राव और भट्ट होते हैं , जो हमारा इतिहास लिखते हैं !! उन्होंने साफ साफ लिखा है की ”गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज,
ले ग्याली पसवान कुमारी, राण राज्या राजपूता लेली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत (1563 AD )।”मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है, “”हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने सदा रण करके विजय प्राप्त की परंतु आज इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत।”” 1563 AD

9-यह वो समय था जब विदेशी बर्बरो के आक्रमण तेज हो रहे थे और वो तथाकथित “अकबर महान” था जिसके समय मे लाखों हिन्दु स्त्रियां पति के मरणोपरांत जोहर की धधकती आग में कूद ( अगनी कुन्ड में )कूद जाती थी ताकी मुगल सेना उन्हे छूना तो दूर देख भी ना सके , क्या उनका बलिदान व्यर्थ हे जो हम उस जलालउद्दीन मुहम्मद अकबर को अकबर महान कहते हे सिर्फ महसूर कर माफ कर देने के कारण भारतीय व्यापारियों ने उसे अकबर महान का दर्जा दिया !!अब ये बात बताईये कि क्या “हिन्दूस्तान में हिन्दूओं” पर तीर्थ यात्रा पर से कोई टेक्स हटा देना कौन सी बड़ी महानता है , यह तो वैसे भी हमारा हक था और बेवकूफ ने एक कायर को अकबर महान का दर्जा दे दिया। (हिन्दूस्तान पर राज करने के लिये अकबर ने अपने दरबार में नौ लोगों को नवरत्न बनाया जिसमे 4 हिन्दू थे । राजा मान सिंह जिन्होंने वास्तविकता मे मुगलो का शोषण किया जजिया कर माफ करवाया जो कि अकबर के समकालीन थे और अकबर के नवरत्नो में से एक थे उन्होंने अकबर से हिन्दूओं पर से तीर्थ यात्रा(महसूर)कर माफ करने की मांग उठाई सत्ता के लालची अकबर को डर था क्यौ कि उसके 4 रत्न हिन्दू थे और अगर वह मान सिंह की मांग को खारिज कर देता तो बाकी के हिन्दू रत्न उसके लिये काम छोड़ सक्ते थे क्यों की अकबर की झूठी सेक्यूलर छवि का असली चहरा सामने आ जाता (और सच्चाई भी यही थी की वह एक कट्टरवादी और डरपोक(फट्टू) किस्म का शासक था उसको यह बात पता थी कि हिन्द पर कट्टर छवि कि बदोलत राज नही किया जा सकता यही वजह थी की उसके पूर्वज हिन्द पर राज ना कर सके थे इस बात को समझते हुए अकबर ने हिन्दू राजाओं में फूट डालने का राजनितिक तरीका अपनाया ) और उसका हिन्दुस्तान पर शासन का सपना अधूरा रह सकता था इस बात के भय से उसने तीर्थ यात्रा कर(टेक्स) हटा दिया, और हमारे ही हिन्दु, राजा मानसिंह को अपशब्द कहकर अकबर को अपना बाप समझते है।।।यह वो समय था जब राणा प्रताप, राणा उदय सिंह,दुर्गा दास, जयमल और फत्ता(फतेह सिंह) जैसे वीर सपूत हुए , यह वही समय था जब महारानी दुर्गावती, महारानी भानूमती, महारानी रूप मती जैसी वीर राजपूतानी क्षत्राणियों ने अकबर से न सिर्फ युद्घ किये बल्कि उसे प्रत्येक युद्व मे बुरी तरह पराजित भी किया!!हिन्दुओ मे शायद ही कोई-कोई इन नामो को जानता होगा।

10- मुगलों ने जब चित्तौड़ किले पर आक्रमण किया तब मात्र 5,000 से 10,000 राजपूत किले पर मैजूद थे जिन से अकबर ने 50,000 से 80,000 मुगलों को लड़वाया , मतलब साफ है की अकबर राजपुताना से बराबरी से लड़ने की दम नहीं रखता था , इस युद्ध में जयमल सिंह राठौढ़ मेड़तिया और फतेह सिंह सिसौदिया ने अकबर के दांत खट्टे कर दिये थे । उस युद्ध में अकबर की आधी से ज्यादा सेना को राजपूतों ने मौत के घाट उतार दिया था और भारी मात्रा में नुकसान पहुंचाया था। अपनी इस नुकसान को देखकर तथा पराजय से खिसयाए अकबर ने चित्तौड़ के लगभग 25,000 गैर इस्लामिक परिवारों(हिन्दुओ) को मौत के घाट उतरवा दिया था (क्योंकि चित्तौड़ के सभी राजपूत जंग मे व्यस्त थे अथवा अपना बलिदान दे चुके थे और जो बची बेचारी प्रजा उससे अकबर ने कोप का भाजन बनाया, यही बात राजा भारमल जानते थे और उन्होंने वहशी अकबर को मूर्ख बनाकर युद्व टाल दिया)।। लाखों मासूमों के सर कटवा दिये , लाखों औरतो को अपने हरम का शिकार बनाया। इस युद्ध के दौरान 8,000 राजपुतानीयाँ जोहर कुण्ड में प्राण त्याग जिन्दा जल गईं ।नोट- अकबर ने राजपूतों के आपसी मन मुटाव का फायदा उठाया क्यो की वह जानता था कि आपसी फूट डालकर ही क्षत्रियो से लड़ा जा सकता है।।

11 .- 1947 की आजादी के बाद पं नेहरू को यह डर था कि जम्म् कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने जिस तरह अपने क्षेत्र पर अपना अधिपथ्य और राज पाठ त्यागने से मना कर दिया था उसी तरह कहीं बाकी की क्षत्रिय रियासतें फिर से अपना रूतबा कायम कर देश पर अपना अधिपथ्य स्थापित ना कर लें इसलिए भारतीय इतिहास में से राजपूताना , मराठा क्षत्रिय ,व अन्य हिन्दू जातीयों के गौरवशाली इतिहास को हटा कर मुगलों का झूठा इतिहास ठूस(भर) दिया ताकी क्षत्रियो का मनोबल हमेशा इस झूठे इतिहास को पढ कर गिरता रहे , लेकिन कुछ बहादुर वीरों के कारनामे छुपाए भी नही छुप सके जैसै राणा प्रताप , छत्रपती शिवाजी,पृथ्वीराज चौहान।हल्दी घाटी युद्घ में अकबर की इतनी बड़ी सेना क्यों नही जीत पाई “प्रताप” से जबकि उस वक्त राणा जी मेवाड़ भी खो चुके थे अत: उनकी आधी सेना मुगलों के चितौड़ आक्रमण में ही समाप्त हो चुकी थी बावजूद इसके नपुंसक व हवसी अकबर क्यों नही जीत पाया 85000 मुगलो को लेकल 10000 राजपूतो से हल्दीघाटी युद्व।। अत: क्यों अकबर ने कभी राणा प्रताप का सामना नही किया !! क्योकी जो राणा का मात्र भाला ही 75 किलो का हो जो राणा रणभूमी में 250 किलो से अधिक वजन के अस्त्र-शस्त्र लेके पूरा दिन रणभूमी में ऐसे लड़ते हो जैसे खेल रहे हो उसका सामना करना मौत का सामना करने के बराबर है और यह बात अकबर को तब पता चली जब राणा प्रताप ने अकबर के तथा सभी इस्लामिक जेहादी सेनापतियों मे सबसे ताकतवर सेनापती व सेना नायक बहलोल खाँ को अपने भाले के प्रथम प्रहार में नाभी से गरदन तक घोडे के धड़ को सीध में फाड़ दिया था ।। इस घटना की खबर सुनकर अकबर इतना डर गया की वह स्वयं कभी राणा प्रताप से नही लड़ा और “”महाराणा प्रताप”” के जीवित रहने तक (12 वर्ष) वह हिन्दुस्तान से बाहर (वर्तमान लाहौर) रहा। अब जरा यह सोचिए की सिर्फ कुछ वीरों ने अकबर की सेना को इस तरह नुकसान पहुचाया तो क्या किसी भी तुर्क मुगलिया, अफगानी या कोई अन्य नपुंसक किन्नर फौज में इतना दम था कि पूरे राजपूताना से लड़ पाते !! ना तो इनमें इतना साहस था ना ही शौर्य इनका साहस तो गंदे राजनितिक कीड़ो ने झूठी किताबों में लिखवाया है !!

12 –नेहरू ने पृथ्वीराज रासो जो कि चंद्रबरदाई (पृथ्वी राज के दरबार में मंत्री) द्वाराकी गई रचनात्मक किताब को राजनितिक तरीके से पहले उसके साक्ष्य़ को नष्ट करवा दिया गया बाद में एतिहासिक दर्जे से हटा कर मात्र पौराणिक कहानी सिद्ध करवा दिया।

नोट – भारतीय इतिहास मे लिखित तौर पर सिर्फ उन वंशों का भारी जिक्र हे जिनके वंश और रियासत पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकीं है मतलब इनके गौरवशाली इतिहास से पंडित नेहरू की सत्ता को कोइ भी क्षति नही पहुचनी थी क्योंकि राजपूत यह वो ताकतवर रियासतें हें जिनका अस्तित्व आज भी जीवित है ।।

13 – मात्र बुंदेला राजपूतों नेअपने साम्राज्य से अकबर के पुत्र एवं उत्तराधिकारी जहांगीर ( कच्छवाहा राजपूतों की परसियन दासी मरियम-उज्-जवानी का पुत्र था ) को अपने राज्य क्षेत्र से खदेढ़ दिया था ।।

14- जहांगीर की माँ व अकबर की बेगम मरियम उज्जवानी अगर राजपूत होती तो अपने पुत्र जहांगीर को बुंदेला राजपूतो से कभी लड़ने ना देती !! और वैसे भी किसी तुर्की का विवाह किसी असली राजपूत से कर दिया जाए तो वह या तो क्रोध से मर जाएगा या फिर अपने रहते उस तुर्क को जिंन्दा नहीं रहने देगा ।।

15 – अब सवाल यह उठता है की आजकल के यह मन घड़ित नाटक(सीरियल) क्यों चलाए जाते है यह इसलिए क्यों की यह इतिहास के किसी भी पन्ने में दर्ज नही है कि मरियम जिसे हम जोधा बोलते हैं वह राजपूत थी दूसरी बात ये की यह एक विवादित मुद्दा है जिसका राजपूत समुदाय कड़ा विरोध करता है इसलिये यह विवादों में आ जाता है और इस झूटे सीरियल को फ्री की प्बलिसिटी मिल जाती है जिसका लाभ प्रोड्यूसर(एकता कपूर जैसो) को मिल जाता है !! और कुछ मासूस हिन्दू लड़कियाँ इस झूठी लव स्टोरी वाले सीरियल को देखकर अकबर के प्रति इम्प्रेस हो जाती है जो की एक कायर और एक अत्याचारी व क्रूर शासक था जिसने लाखों औरतों को अपने हरम का जबरन शिकार बनाया उनकी मजबूरियों का फायदा उठाकर और आजकल की माँर्डन लड़कियाँ बड़े आसानी से लव जिहाद ( इसका मतलब धर्म को बढ़ाना ज्यादा से ज्यादा लोगों को मुसलमान बनाना मार के जबरन या प्यार से भी ) का शिकार बन जातीं है और किसी भी मुसलमान लड़के के झूठे प्यार में फँस जातीं है , बाद में जों होता है उसे में यहाँ लिख नही सकता लेकिन इन सब के पीछे इस्लामिक कट्टरता और धार्मिक राजनीति होती है जिसमें वर्षो से काँग्रेस का हाथ रहा है लेकिन हकीकत तो यही है मित्रों की अकबर एक क्रूर व अत्याचारी शासक था !! जिसने अपना झूठा इतिहास लिखवाया और मरियम(जोधा) जो कि खुद एक दासी होकर भी अकबर की बेगम नहीं बनना नही चाहती थी ।।

16- अकबर की अकबरनामा जिसे कुछ मूर्ख अकबर की आत्मकथा कहते है वह उसकी आत्मकथा नहीं कहला सकती क्योकिआत्म कथा एक मनुष्य खुद लिखता है और अकबर एक अनपढ़ शासक था अकबर नामा के रचनाकार मोहोम्मद अबुल फजल थे जो की अकबर के उत्तीर्ण दर्जे ( उच्च कोटी ) के चाटुकार थे अब अगर वो उसमें ये भी लिख देते की अकबर आसमान के तारे गिनने की क्षमता रखता था तो आप आज परीक्षाओं में इस प्रश्न को भी पढ़ रहे होते ।अब आप ही देखे जो राजा पढा-लिखा न हो वह न तो अध्ययन कर सकताऔर न ही कुछ सोच समझ सकता है वह क्या अपनी प्रजा का भला करेगा वह अपना अधिकतर समय शारीरीक सुखों पर ही खर्च करेगा तो वह काहे का महान।।

17- औरंगजेब को जब अकबर का विवाह दासी की पुत्री से होने वाली बात पता चली तो उसने अकबर के द्वारा हटाए गए जिजया कर(tax for non muslims) और महसूर कर(tax for hindus for doing tirath तीर्थ) को दोबारा चलवाया इसके साथ – साथ उसने इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा दिया जो कि मुगलिया सल्तनत के पतन का कारण बनी अंत: राजपूतों , मराठों ने मिलकर मुगलों को खत्म कर डाला और यह थी इतिहास की पहली क्रांती इसके बाद अंग्रेजों का विस्तार हुआ जिन्हें मुगलों ने ही निमंत्रण दिया था ।।

हुकुम क्षत्रियों का इतिहास क्षत्रिय बता सकते है और मुगलों का इतिहास काँन्ग्रेस, वामपंथी।।

जोधा नाम का पात्र शुरू होता है मुगले आजम फिल्म से जिसमें काल्पनिक तौर पर अकबर की बेगम का नाम जोधाबाई रख दिया और इस कथित जोधा बाई को आमेर के राजा भारमल की राजकुमारी बता दिया. फिल्म में जोधाबाई नाम प्रचारित होने के बाद यह इतिहास बन गया और भारत के इतिहास को तोड़ मरोड़ने को लालायित बैठे वामपंथी लेखकों ने अपनी इतिहास पुस्तकों में इसी तथ्य को प्रमुखता से उजागर कर दिया| इस तरह एक मनोरंजन के नाम पर बनी फिल्म ने इतिहास के साथ खिलवाड़ कर दिया |

राजस्थान के स्थानीय इतिहासकारों ने इस बात का पुरजोर खण्डन भी किया कि कथित जोधाबाई आमेर की राजकुमारी नहीं थी. आमेर के राजवंश की वंशावलियों व अन्य दस्तावेजों में कहीं भी जोधाबाई नाम की किसी राजकुमारी का उल्लेख इतिहासकारों को नहीं मिला, बावजूद वामपंथी व छद्म सेकुलर इतिहासकार इस गलत तथ्य को प्रचारित करते रहे| इनके प्रचार को फिल्म व टीवी सीरियल निर्माता कम्पनियों ने भी भूनाने की भरसक कोशिश की| जोधा-अकबर सीरियल के निर्माता बालाजी टेलीफिल्म्स के चेयरमेन अभिनेता जितेन्द्र के साथ वार्ता में जब श्री राजपूत करणी सेना, इतिहासकार टीम तथा सैनिकों के साथ गयी तब इतिहासकारों ने ऐतिहासिक तथ्य रखे तो जितेन्द्र ने यह माना कि जोधाबाई नाम का कोई पात्र था ही नही और नही कोई भी हिन्दु राजकुमारी अकबर के साथ ब्याही गई थी, लेकिन सीरियल में उनका काफी धन लग गया अत: वे पीछे नहीं हट सकते| सीरियल का नाम बदलने की बात पर उनका कहना था कि अकबर के साथ जोधा के बजाय कोई दूसरा नाम जमेगा नहीं क्योंकि यही प्रचारित हो चूका है| इस तरह जानते बुझते धन कमाने के लिए फिल्म, टीवी वाले जोधा नाम छोड़ने को राजी नहीं|
राजस्थान के इतिहासकारों व राजपूत संगठनों ने ऐतिहासिक तथ्य पेश करते हुए कई बार यह साबित करने की कोशिश की कि कथित जोधाबाई किसी विदेशी महिला की संतान थी, लेकिन इस बात को कथित सेकुलर व वामपंथी गैंग ने हवा में उड़ाते हुए खारिज कर दिया| अभी हाल ही में गोवा के एक लेखक कोरिया ने जोधाबाई को लेकर अपनी शोध पुस्तक में बड़ा खुलासा किया है, यह सच जानकर हमें कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि हम शुरू से ही कह रहे है कि अकबर की बीबी व जहाँगीर की माँ राजपूत नहीं विदेशी लड़की थी|

गोवा के लेखक लुईस डी असीस कॉरिया ने अपनी किताब ‘पुर्तगीज इंडिया एंड मुगल रिलेशंस 1510-1735’ में कहा है कि जोधाबाई वास्तव में एक पुर्तगाली महिला थीं, जिनका नाम डोना मारिया मैस्करेनहास था, जो पुर्तगाली जहाज से अरब सागर होते हुए आईं थी।

आज इस्लामियै तथा दलालों से ज्यादा हिन्दु ही ऐतिहासिक अध्ययन के अभाव मे उके द्वारा बनाई हुई मनगढंत कहानियों को जोर देते है। अतः आपसे अनुरोध है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को जागरूक करे।इस सम्बन्ध मे गोवा के एक बहुत ही पहुँचे हुये इतिहासकार Luis de Assis Correia द्वारा लिखित पुस्तक जो कि सम्पूर्ण साक्ष्यों द्वारा प्रमाणित है – PORTUGUESE INDIA AND MUGHAL RELATIONS (1510-1735)

Nation, politics, Special day

सर्जिकल स्ट्राइक : हिंद की सेना के जज़्बे को सलाम

जब 29 सितंबर, 2016 को भारत के मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल रणवीर सिंह ने संवादादाता सम्मेलन में घोषणा की कि भारत ने सीमापार चरम पंथियों के ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की है तो पूरी दुनिया अवाक रह गई।
ऐसा नहीं था कि इससे पहले लाइन ऑफ़ कंट्रोल के पार सर्जिकल स्ट्राइक न की गई हो, लेकिन ये पहली बार था कि भारतीय सेना, दुनिया को साफ़ साफ़ बता रही थी कि वास्तव में उसने ऐसा किया था।
कारण था, भारतीय सेना के उड़ी ठिकाने पर चरमपंथियों द्वारा किया गया हमला जिसमें 17 भारतीय सैनिक मारे गए थे और दो सैनिकों की बाद में अस्पताल में मौत हो गई थी।
जैसे ही ये ख़बर फैली दिल्ली के रायसिना हिल्स पर गतिविधियाँ तेज़ हो गईं. आनन फानन में अत्यंत गोपनीय ‘वार रूम्स’ में भारत के सुरक्षा प्रबंधन की खुफ़िया बैठकें बुलाई गई जिसमें कम से कम एक बैठक में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ शामिल हुए।
इस विषय पर आधरित हाल में ही आई एक पुस्तक आई है “’इंडियाज़ मोस्ट फ़ियरलेस-ट्रू स्टोरीज़ ऑफ़ माडर्न मिलिट्री हीरोज़” जिसके लेखक हैं राहुल सिंह एवं शिव अरूर। ‘इंडियाज़ मोस्ट फ़ियरलेस-ट्रू स्टोरीज़ ऑफ़ माडर्न मिलिट्री हीरोज़’ के अनुसार सीमा पार चरमपंथियों के ठिकानों को ध्वस्त करने की ज़िम्मेदारी एलीट पैरा एसएफ़ के टूआईसी मेज़र माइक टैंगो को दी गई. ये उनका असली नाम नहीं है. सुरक्षा कारणों से इस पूरी किताब में उन्हें उनके इस ऑपरेशन के दौरान रेडियो नाम मेज़र माइक टैंगों के नाम से चित्रित किया गया है।
स्पेशल फ़ोर्स के अधिकारियों को क्रेम डेला क्रेम ऑफ़ सोल्जर्स कहा जाता है. ये भारतीय सेना के सबसे फ़िट, मज़बूत और मानसिक रूप से सजग सैनिक होते हैं. इनकी फ़ैसला लेने की क्षमता सबसे तेज़ होती है और जहाँ ज़िदगी और मौत का मामला हो, इनका दिमाग बहुत तेज़ी से काम करता है . ख़तरनाक परिस्थितियों में ज़िंदा रहने की कला जितनी इन्हें आती है किसी को नहीं. सेना का इस्तेमाल आमतौर से रक्षण के लिए किया जाता है, लेकिन स्पेशल फ़ोर्सेज़ शिकारी होते हैं. उनका इस्तेमाल हमेशा आक्रमण के लिए होता है .
इस बीच दिल्ली में इस पूरे मामले को इस तरह लिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो. नरेंद्र मोदी ने कोझिकोड़ में भाषण देते हुए उड़ी पर एक शब्द नहीं कहा।
उन्होंने ये ज़रूर कहा कि भारत और पाकिस्तान को ग़रीबी, अशिक्षा और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में सुषमा स्वराज ने भी उड़ी पर भारत के गुस्से का कोई इज़हार नहीं किया. पाकिस्तान को ये आभास देने की कोशिश की गई कि सब कुछ सामान्य है जबकि अंदर ही अंदर सर्जिकल स्ट्राइक की तैयारी ज़ोरों पर थी।
उधर मेज़र टैंगो की टीम ने पाकिस्तान के अंदर अपने चार सूत्रों से संपर्क किया. इनमें से दो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के ग्रामीण थे और दो जैश-ए-मोहम्मद में भारत के लिए काम कर रहे जासूस थे. चारों लोगों ने अलग अलग इस बात की पुष्टि की कि चरमपंथियों के लॉंचिंग पैड में चरमपंथी मौजूद हैं।
माइक टैंगो के नेतृत्व में 19 भारतीय जवानों ने 26 सितंबर की रात साढ़े आठ बजे अपने ठिकानों से पैदल चलना शुरू किया और 25 मिनटों में उन्होंने एलओसी को पीछे छोड़ दिया।
टैंगो के हाथ में उनकी एम 4 ए1 5.56 एमएम की कारबाइन थी. उनकी टीम के दूसरे सदस्य एम4 ए1 के अलावा इसराइल में बनी हुई टेवर टार-21 असॉल्ट रायफ़लें लिए हुए थे।
माइक टैंगो ने शिव अरूर और राहुल सिंह को बताया कि उन्होंने इस अभियान के लिए स्पेशल फ़ोर्स में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ जवान चुने थे। लेकिन इस तरह के अभियान में कुछ लोगों का हताहत होना अवश्यसंभावी है।
असल में इसकी संभावना 99.9999 फ़ीसदी थी और उनकी टीम ये क़ुरबानी देने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी थी. टैंगो मान कर चल रहे थे कि इस अभियान का सबसे मुश्किल चरण होगा वापसी का, जब पाकिस्तानियों को उनके वहाँ होने के बारे में पूरी जानकारी हो मिल चुकी होगी।
चार घंटे चलने के बाद टैंगो और उनका टीम अपने लक्ष्य के बिल्कुल नज़दीक पहुंच गई. वो वहाँ से 200 मीटर की दूरी पर थे कि वो हुआ जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी।
लांच पैड से अचानक फ़ायरिंग शुरू हो गई. एक सेकंड को उन्हें लगा भी कि क्या पाकिस्तानियों को उनके आने का पता चल गया है।
सारे जवान एक सेकेंड से भी कम समय में ज़मीन के बल लेट गए, लेकिन टैंगो के अनुभवी कानों ने अंदाज़ा लगा लिया कि ये अंदाज़े से की गई फ़ायरिंग है और उसका निशाना उनकी टीम नहीं है।
लेकिन एक तरह से ये बुरी ख़बर भी थी, क्योंकि इससे साफ़ ज़ाहिर था कि लांच पैड के अंदर रह रहे चरमपंथी सावधान थे।
टैंगो ने तय किया कि वो उस इलाक़े में छिपे रहेंगे और अपना हमला 2 घंटे बाद अगली रात में बोलेंगे.
ये इस ऑपरेशन का सबसे संवेदनशील और ख़तरनाक हिस्सा था।
रात के अंधेरे में तो दुश्मन के इलाक़े में छिपे रहना शायद इतना मुश्किल काम नहीं था, लेकिन सूरज चढ़ने के बाद उस इलाक़े में जमे रहना ख़ासा जीवट का काम था।
लेकिन उससे उन्हें एक फ़ायदा ज़रूर होने वाला था कि उन्हें उस इलाक़े को पढ़ने और रणनीति बनाने के लिए 24 घंटे और मिलने वाले थे. टैंगो ने आख़िरी बार सेटेलाइट फ़ोन से अपने सीओ से संपर्क किया और फिर उसे ऑफ़ कर दिया।
28 सितंबर का रात दिल्ली में भारतीय कोस्ट गार्ड कमांडर्स का वार्षिक भोज हो रहा था, लेकिन सभी चोटी के मेहमान रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह ने अपने मेज़बानों से माफ़ी मांगी और सेना के मिलिट्री ऑपरेशन रूम पहुंच गए ताकि वहाँ से उस समय शुरू हो चुके इस अभियान को दिल्ली से मॉनीटर किया जा सके।
आधी रात को दिल्ली से 1000 किलोमीटर दूर टैंगो और उनकी टीम अपने छिपे हुए स्थान से निकले और उन्होंने लाँच पैड की तरफ़ बढ़ना शुरू किया.
लांचपैड से 50 गज़ पहले टैंगो ने अपनी नाइट विजन डिवाइस से देखा कि दो लोग चरमपंथियों के ठिकाने पर पहरा दे रहे हैं।
टैंगो ने 50 गज़ की दूरी से निशाना लिया और एक ही बर्स्ट में दोनों चरमपंथियों को धाराशाई कर दिया. पहली गोली चलने तक ही कमांडोज़ के मन में तनाव रहता है. गोली चलते ही ये तनाव जाता रहता है .
इसके बाद तो गोलियों की बौछार करते हुए टैंगो के कमांडो लॉंच पैड की तरफ़ बढ़े. अचानक टैंगो ने देखा कि दो चरमपंथी जंगलों में भागने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो भारतीय सैनिकों पर पीछे से हमला कर सकें।
टैंगो ने अपनी 9एमएम बेरेटा सेमी ऑटोमेटिक पिस्टल निकाली और 5 फ़ीट की दूरी से उन चरमपंथियों पर फ़ायर कर उन्हें गिरा दिया.
माइक टैंगो और उनकी टीम वहाँ पर 58 मिनटों तक रही. उन्हें पहले से ही बता दिया गया था कि वो शवों को गिनने में अपना समय बरबाद न करें. लेकिन लेकिन एक अनुमान के अनुसार, चार लक्ष्यों पर कुल 38 से 40 चरमपंथी और पाकिस्तानी सेना के 2 सैनिक मारे गए. इस पूरे अभियान के दौरान पूरी तरह से रेडियो साइलेंस रखा गया।
अब टैंगो के सामने असली चुनौती थी कि किस तरह वापस सुरक्षित भारतीय सीमा में पहुंचा जाए, क्योंकि अब तक पाकिस्तानी सेना को उनकी उपस्थिति का पता चल चुका था।
राहुल सिंह लिखते हैं, “माइक टैंगो ने हमे बताया कि अगर मैं कुछ इंच लंबा होता तो आपके सामने बैठ कर बात न कर रहा होता. पाकिस्तानी सैनिकों की गोलियाँ हमारे कानों के बग़ल से गुज़र रही थीं. जब ऑटोमेटिक हथियार की गोली कान के बगल से गुज़रती है तो आवाज़ आती है…. पुट.. पुट.. पुट. हम चाहते तो उसी रास्ते से वापस आ सकते थे, जिस रास्ते से हम वहाँ गए थे. लेकिन अपने जानबूझ कर वापसी का लंबा रास्ता चुना।
“हम पाकिस्तानी क्षेत्र में और अंदर गए और फिर वहाँ से वापसी के लिए वापस मुड़े. बीच में 60 मीटर का एक ऐसा हिस्सा भी आया जहाँ आड़ के लिए कुछ भी नहीं था. सारे कमांडोज़ ने पेट के बल चलते हुए उस इलाक़े को पार किया। ”
“टैंगो की टीम ने सुबह साढ़े चार बजे भारतीय क्षेत्र में क़दम रखा. लेकिन तब भी वो पूरी तरह से सुरक्षित नहीं थे. लेकिन तब तक वहाँ पहले से मौजूद भारतीय सैनिकों ने उन्हें कवर फ़ायर देना शुरू कर दिया था. सबसे बड़ी बात ये थी कि इस पूरे अभियान में टैंगो की टीम का एक भी सदस्य न तो मारा गया और न ही घायल हुआ।”
भारत की सीमा पार करते ही एक चीता हेलिकॉप्टर, टैंगो को 15 कोर के मुख्यालय ले गया. उनको सीधे ऑपरेशन रूम ले जाया गया. वहाँ उनके सीओ ने उन्हें गले लगाया. कोर कमांडर लेफ़्टिनेंट जनरल सतीश दुआ को देखते ही टैंगो ने उन्हें सेल्यूट किया.
जब जनरल दुआ टैंगो से मिल रहे थे, एक वेटर एक ट्रे में ब्लैक लेबेल व्हिस्की भरे कुछ ग्लास ले कर आया. जनरल ने हुक्म दिया, इन्हें वापस ले जाओ. सीधे बोतल लाओ. तुम्हें पता नहीं कि ये लोग गिलास खा जाते हैं. ये सही भी है क्योंकि स्पेशल फ़ोर्स के कमांडोज़ को गिलास खाने की ट्रेनिंग दी जाती है।
“वेटर तुरंत ब्लैक लेबेल की बोतल ले आया. जनरल दुआ ने बोतल अपने हाथ में ली और टैंगो से अपना मुंह खोलने के लिए कहा. वो तब तक टैंगो के मुंह में व्हिस्की डालते रहे जब तक उन्होंने बस नहीं कह दिया. उसके बाद टैंगों ने भी जनरल दुआ के मुंह में सीधे बोतल से व्हिस्की उड़ेली।
जब टैंगो उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल डीएस हूदा से मिलने ऊधमपुर गए तो व्हिस्की का एक और दौर चला. राहुल बताते हैं, “टैंगो ने मन ही मन सोचा, कोई खाना दे दो. सारे दारू ही पिला रहे हैं.”

20 मार्च, 2017 को सर्जिकल स्ट्राइक करने वाली टीम के पाँच सदस्यों को शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। मेज़र टैंगो को राष्ट्पति प्रणव मुखर्जी ने कीर्ति चक्र से सम्मानित किया। उस समय इस बात का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया कि कीर्ति चक्र पाने वाले और कोई नहीं, सर्जिकल स्ट्राइक के हीरो मेज़र माइक टैंगो ही हैं।
बीबीसी हिंदी एवं “’इंडियाज़ मोस्ट फ़ियरलेस-ट्रू स्टोरीज़ ऑफ़ माडर्न मिलिट्री हीरोज़ के आधार पर।

Religion, Review

“वीरे दी वेडिंग” – भारतीय अफसोस

“वीरे दी वेडिंग” चार लड़कियों की कहानी हैं जिन्हें बारहवीं कक्षा की परीक्षा सम्पन्न होने की ख़ुशी में घरवाले घर में शराब पार्टी अरेंज करके देते हैं।
पहली लड़की विवाह से पूर्व अपने बॉस से सेक्स सम्बन्ध बनाती है। यह लड़की अपनी सहेलियों के कहने पर अपने मंगेतर को भरी महफ़िल में किस करने की कोशिश करती है और जब मंगेतर इस पर ऐतराज करता है तो सरे-आम उसको माँ की गाली देती है। यही लड़की अपनी सहेली की शादी के बीच से निकल कर एक ऐसे लड़के के साथ जाकर सो जाती है जिसका वह नाम भी नहीं जानती।
दूसरी लड़की का पति उसे हस्त-मैथुन करते हुए पकड़ लेता है। वह लड़की अपने पति को छोड़कर अपने पिता के घर लौट आती है। यह लड़की अपनी सहेली को इस बात पर ताना देती है कि वह किसी से सेक्स किये बिना शादी कैसे कर सकती है। यह लड़की अपने पिता को बताती है कि उसके पति ने उसे क्यों छोड़ दिया तो उसका पिता उसे कहता है “मुझे पहले बताना था, तेरे पति को तो मैं लटका दूँगा।”
तीसरी लड़की अपनी सहेली को बताती है कि टेस्ट ड्राइव किये बिना तो मैं गाड़ी भी न लूँ फिर तू पति कैसे ले सकती है।
चौथी लड़की अपने प्रेमी से इस बात पर आश्चर्य जताती है कि जब हम दो साल से साथ रह रहे हैं तो फिर तू शादी क्यों करना चाहता है!
ये चारों लड़कियां बेहद सभ्य परिवारों से आती हैं इसलिए “फ़िल्म की स्क्रिप्ट की तथाकथित डिमांड पर” हिंदी भाषा के कुछ अश्लील शब्द जिन्हें हम गाली कहते हैं उनको बीप कर दिया गया है। लेकिन इन्हीं लड़कियों ने फ़िल्म में कुछ अंग्रेजी की शब्दावली का प्रयोग भी किया है। अंग्रेजी वह पतित पावनी है जिसमें नहाकर अश्लीलता भी स्टेटस सिंबल बन जाती है। इसीलिए पूरी फिल्म में बार बार FUCK, ASS, SHIT जैसे पवित्र शब्दों को सेंसर ने स्वीकार कर लिया।
“मेरी लेले”; “तेरी लेने के लिए डिग्री भी चाहिए”; “उसे अपनी तीसहजारी दिखा दे”; “चढ़ जा”; “तूने बॉस को ठोक दिया”; “अपना हाथ जगन्नाथ”; ओ हेलो, हमारा भी ले लो” और “मेरी फटी पड़ी है” जैसे संवाद इन चारों लड़कियों के मुँह से उचर कर फ़िल्म की और स्त्री अस्मिता की शोभा बढ़ा रहे हैं।
जब-जब इन भौंडे संवादों और अश्लील इशारों पर सिनेमा हॉल में सीटियां गूंजी तब-तब मुझे नारी सशक्तिकरण के अभियान अपने मुँह पर कालिख पोते खड़े दिखाई दिए। जब जब फ़िल्म में सोनम कपूर पर उसकी सहेलियों ने अश्लील कमेंट किये तब तब लड़की को घूरने पर भी उसे प्रताड़ना मानने वाला कानून और अधिक अंधा प्रतीत हुआ। जब स्वरा भास्कर के हस्तमैथुन दृश्य पर सिनेमा हॉल का अंधेरा सिसकारियों से भर गया तब तब मुझे “नारी-सम्मान” के नारे लूले नज़र आने लगे।
कानून कहता है कि किसी स्त्री को अश्लील इशारे करना या उसे अश्लील सामग्री दिखाना अपराध है। लेकिन फ़िल्म की चारों अबला नारियाँ फुकेट में नंगे नाच देखने जाएँ तो यह बोल्डनेस है।
इस फ़िल्म में प्रदर्शित लड़कियां समाज के जिस चेहरे का चित्र उतार रही हैं उसे देखकर कानून, मर्यादा, समाज और संस्कृति के परदों के पीछे जारी सभ्यता के इस भौंडे नाटक का यवनिका पतन हो जाएगा।

Nation, Special day

जन्मदिन विशेष : राम प्रसाद बिस्मिल

1897 में आज के ही दिन यानी 11 जून को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ था, बहुत कम ही लोग जानते हैं कि इस सरफरोश क्रांतिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व में संवेदशील कवि/शायर, साहित्यकार व इतिहासकार के साथ एक बहुभाषाभाषी अनुवादक का भी निवास था और लेखन या कविकर्म के लिए उसके ‘बिस्मिल’ के अलावा दो और उपनाम थे- ‘राम’ और ‘अज्ञात’.

इतना ही नहीं, 30 साल के जीवनकाल में उसकी कुल मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें से एक भी गोरी सत्ता के कोप से नहीं बच सकीं और सारी की सारी जब्त कर ली गयीं. हां, इस लिहाज से वह भारत तो क्या, संभवतः दुनिया का पहला ऐसा क्रांतिकारी था, जिसने क्रांतिकारी के तौर पर अपने लिए जरूरी हथियार अपनी लिखी पुस्तकों की बिक्री से मिले रुपयों से खरीदे थे.

‘बिस्मिल’ की माता मूलरानी का जिक्र किए बिना बात अधूरी रहेगी. वे ऐसी वीरमाता थीं कि शहादत से पहले ‘बिस्मिल’ से मिलने गोरखपुर जेल पहुंचीं तो उनकी डबडबाई आंखें देखकर भी धैर्य नहीं खोया। कलेजे पर पत्थर रख लिया और उलाहना देती हुई बोलीं, ‘अरे, मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है और उसके नाम से अंग्रेज सरकार भी थरथराती है. मुझे पता नहीं था कि वह मौत से इतना डरता है! फिर जैसे इतना ही काफी न हो, उनसे पूछने लगीं, ‘तुझे ऐसे रोकर ही फांसी पर चढ़ना था तो तूने क्रांति की राह चुनी ही क्यों? तब तो तुझे तो इस रास्ते पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था। ’
बताते हैं कि इसके बाद ‘बिस्मिल’ ने बरबस अपनी आंखें पोछ डालीं और कहा था कि उनके आंसू मौत के डर से नहीं।

शहीद होने से एक दिन पूर्व रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने एक मित्र को पत्र लिखा –

“19 तारीख को जो कुछ होगा मैं उसके लिए सहर्ष तैयार हूँ।
आत्मा अमर है जो मनुष्य की तरह वस्त्र धारण किया करती है।”
यदि देश के हित मरना पड़े, मुझको सहस्रो बार भी।
तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी।।
हे ईश! भारतवर्ष में, शतवार मेरा जन्म हो।
कारण सदा ही मृत्यु का, देशीय कारक कर्म हो।।
मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफाक अत्याचार से।
होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से।।
उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का।
तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लव लेश का।।सब से मेरा नमस्कार कहिए,”
      तुम्हारा
बिस्मिल…

रामप्रसाद बिस्मिल की शायरी, जो उन्होने कालकोठरी में लिखी या गाई थी, उसका एक-एक शब्द आज भी भारतीय जनमानस पर उतना ही असर रखता है जितना उन दिनो रखता था। इस शायरी का हर शब्द अमर है।

सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना, बाजुए कातिल में है।।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है।।

शहीद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, जिन्होंने एक तरफ तो राष्ट्र-यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी, दूसरी तरफ़ उनके शब्दों ने हज़ारों ‘बिस्मिलों’ पैदा कर दिए। आज उनके जन्मदिवस पर उनको आकाश भर नमन!

🇮🇳🙏❤️

Nation, politics

मोदी जी से इतनी नफरत, हरा नहीं सके तो हत्या की करने लगे साजिश!

हिंदुस्तान के यशस्वी प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी, मोदी जी ने जब से राजनीति में कदम रखा उसी दिन से उन्हें विपक्षी पार्टियों की अंतहीन नफरत का सामना करना पड़ा. आजाद भारत की राजनीति में शायद ही किसी अन्य राजनेता को इतना ज्यादा अछूत माना गया होगा, जितना ज्यादा नरेंद्र मोदी को माना गया. लेकिन जहाँ मोदी विरोधियों ने मोदी जी से जितनी ज्यादा नफरत की, वहीं देश की जनता ने मोदी जी को उतना जी ज्यादा प्यार दिया. मोदी विरोधियों ने उनकी मुख्यमंत्री की गद्दी छीनने की कोशिश की तो हिन्दुस्तान की जनता ने मोदी को अपना नायक घोषित कर दिया तथा उनको देश की सत्ता सौंप दी.

अब एक बार फिर से वही नरेंद्र मोदी जी विरोधियों के निशाने पर हैं। लेकिन इस बार मोदी जी के प्रति उनकी विरोधियों की नफरत भरी सनसनीखेज साजिश के खुलासे से पूरा देशब सन्न रह गया है। खुलासा हुआ है कि पूर्व प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी जी की तरह ही नरेंद्र मोदी जी की ह्त्या की साजिश रची जा रही थी. देश को सकते में डालने वाला ये खुलासा हुआ है भीमा-कोरेगांव हिंसा के आरोपियों की गिरफ्तारी के दौरान। पुणे पुलिस को एक आरोपी के घर से ऐसा पत्र मिला है, जिसमें ‘राजीव गांधी की हत्या’ जैसी प्लानिंग का उल्लेख है। पत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने की बात कही गयी है।
पुलिस के अनुसार, प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र जी ह्त्या की साजिश रचने से संबंधित पत्र विल्सन के दिल्ली के फ्लैट से बरामद किया गया है। पत्र में कहा गया है कि “मोदी ने 15 राज्यों में भाजपा को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। यदि ऐसा ही रहा तो सभी मोर्चों पर पार्टी के लिए दिक्कत खड़ी हो जाएगी… कॉमरेड किसन और कुछ अन्य वरिष्‍ठ कॉमरेड्स ने मोदी राज को समाप्त करने के लिए कुछ मजबूत कदम बताये हैं। हम सभी राजीव गांधी जैसे हत्याकांड पर विचार कर रहे हैं…यह आत्मघाती जैसा प्रतीत होता है और इसकी भी अधिक संभावनाएं हैं कि हमें सफलता हाथ नहीं लगे, लेकिन हमें लगता है कि पार्टी हमारे प्रस्ताव पर विचार करे, पत्र में आगे लिखा गया है कि उन्हें रोड शो में टारगेट करना एक असरदार रणनीति का हिस्सा हो सकता है, हमें लगता है कि पार्टी का अस्तित्व किसी भी त्याग से ऊपर है… बाकी बातें अगले पत्र में… “

जिन कॉमरेडों को देश की जनता ने खदेड़ दिया, वो कॉमरेड अब मोदी को मारकर अपना वजूद बचाए रखना चाहते हैं। इससे भी आश्चर्य की बाते ये है कि भीमा-कोरेगांव हिंसा में कांग्रेस पर भी सवाल उठे हैं भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान एक पत्र दिखाया था जिसमे साफ़ साफ लिखा है कि भीमा कोरेगांव हिंसा में कांग्रेस तथा जिग्नेश मेवाणी बिचौलिए की भूमिका में हैं तथा उस प्रायोजित हिंसा को कांग्रेस फंडिंग कर रही है। तो क्या ये माना जाए कि कांग्रेस पार्टी की प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस खौफनाक साजिश में शामिल थी। जब जनता के बीच जाकर चुनाव न जीत सके तो प्रधानमन्त्री की हत्या करने पर उतारू हो गये।

अब लोकतंत्र ख़तरे में नहीं है ? असहनहीलता ब्रिगेड ने मौनव्रत धारण क्यों कर लिया? यही षड्यंत्र अगर किसी दूसरे देश में होता तो अब तक हंगामा मच गया होता। यहां इतना सन्नाटा क्यों है भाई..?

Nation, Special day

एक फौजी बेटे का खत माँ के नाम

“माँ प्रणाम” ……_/\_

आप अक्सर ये शिकायत करती हैं कि मैं फोन नही करता, कहती हो कि एक माँ इधर भी है, भारत माँ के अलावा। इसलिए पहली बार कोई खत लिख रहा हूँ आपको। जितनी हैरानी आपको हो रहीं होगी, उतनी ही मुझे भी है। फोन पर बात करना और खत लिखना दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। पर ये खत कुछ खास है, खास इसलिए क्योंकि ये मेरी गैरमौजूदगी में आपसे मेरी वकालत करेगा। ये अपने अंदर वो सब लिए हुए है जो मैंने आपको कभी बताया नहीं। ऐसा कुछ जरूरी भी नहीं है पर ये आपको मेरा ‘जुबान लड़ाना’ याद दिलाएगा।

याद है जब बचपन में आप मुझे समझाती थी कि स्कूल में अपने से होशियार बच्चों के साथ आगे बैठा करो तो मैं हॉ में सिर हिला देता था पर फिर ये सोचता था कि होशियार बच्चों की माँ भी तो उन्हें ऐसा ही बोलती होंगी फिर वो मुझे अपने साथ क्यों बिठाएंगे .? ऐसा सोचकर मैं फिर रोज की तरह अपने उन्हीं दोस्तों के साथ बैठ जाता था।

यहाँ सरहद पर भी मैं ऐसा ही सोचता हूँ कि आपकी तरह हर किसी जवान की मॉ उसके लिए फिक्रमंद रहती होगी उसको सलामती के लिए भगवान से प्रार्थना करती होंगी। और ये सोचकर में खुद दूसरों से जागे रहने को कोशिश करता हूँ ताकि दुश्मन से पहला सामना मेरा हो।

आपको याद है, जब में थोड़ा और बड़ा हुआ तो आप मेरी शरारत करने पर नाराज हो जाती थीं और मुझे पड़ोस के शर्मा अंकल के बेटे की तरह समझदार बनने को कहते थीं। मैं जब फिर भी नहीं मानता था तो आप मुझे चिढाने के लिए झूठेमुँह कहते थे कि मैं आपका बेटा नहीं हूँ। तब ये सुनके मुझे बहुत बुरा लगता था और मैं चाहते हुए भी शरारत नहीं करता था।

आज यहाँ बॉर्डर पर होते हुए मुझे अक्सर ये ख्याल जाता है कि आपसे उन चिढ़ाए जाने वाले पलों का बदला लूँ और बोलूं कीं आप मेरी माँ नहीं हो। मैं आपकी बिल्कुल भी फिक्र नही करता और न ही बात मानुगा। मेरी माँ तो बस भारत माँ हैं और में इन्हें के लिए कुर्बान हो जाऊंगा।
आपको फोन पर तो ये बोल नहीं सकता पर, जब आप खत पढ़कर ये जान जाओगे और बुरा मानोगे तो भगवान से प्राथर्ना करना कि वो अगले जन्म में मुझे आपका ही बेटा बनाये ताकि फिर आप मुझसे इस बात का बदला ले सको।
आशा करता हूँ कि इस खत को पढ़ते वक्त आपको मुझपे जरूर गर्व होगा और आप इस खत का और अपना हमेशा ख्याल रखोगे।

आपका ,
लाडला

हर उस माँ को मेरा चरणस्पर्श प्रणाम है जिसने अपने कलेजे के टुकड़े को, भारत माता की आँचल के टुकड़ों की रक्षा के लिए सरहद पर भेजा है।

जय हिंद